उन्हें क्या नाम दूँ

शाम ढलते ही चांद निकलता है 
अंबर की आंचल में कोई फूल खिलता है 
 इन अरमानों को दिल में क्या अंजाम दूं 
दिल समझा पता नहीं उन्हें क्या नाम दूं 
 हर शाम सुहानी हो जाती है,
जब याद तुम्हारी आती है
 मां मंदिर में गुंजन होता है
 हर कंपन तुम्हें ढूंढता है
 चाहत के इस पलकों में कैसे विश्राम दूं |
दिल समझा पता नहीं तुम्हें क्या नाम दूं ||
 रोशनी हो जाती है दिल के अंधेरे में
 किरण खिल जाती है यादों के बसेरे में 
 रूप बन जाता है दिल की दीवारों पर
 रूह को जाता है ऐसे विचारों पर
 यादों की इस बारिश को कैसे मैं संभाल लूं |
 दिल समझा पता नहीं उन्हें क्या नाम दूं  ||

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