रूप कामिनी
बालापन अब बीत गया,
आई नूतन तरुनाई ।
कंदर्प रूप लजाने को ,
वह रति रूप में आई ।
बसंत-सा श्रृंगार उसका ,
देह फुलवारी बन आयी है l
कार्य- निवृति लेकर जिसको ,
प्रकृति निज हाथो से सजाई है ।।
कांति वर्णन क्या क्या करें ,
चांद ही कामिनी बन आया है।
दूर खड़ा वह देख रहा,
मानो चंद्रकला इसी से पाया है ।।
उसके गुलाबी होठों पर ,
मुग्ध कई जिंदगी हुई ।
एक बार सही , सौ बार सही ,
थोड़ी -सी सही पर बंदगी हुई ।।
नैनो के चक्कर में उसकी ,
रातें जागकर गुजरी थी।
एक मीठा सा एहसाह दिलाकर ,
जब वो करीब से गुजरी थी ।।
शंख समान ग्रीवा थी उसकी,
सुघड़ कपोल रसाल से ।
वक्ष के उभार उसके ,
लगते थे कमाल से ।।
अधर से थी टपक रही ,
एक अलौकिक लालिमा
लंक को छूते फिरे ,
केश सुघर कालिमा ।
अनुपम सुराही सी लटकती ,
कटिभाग की दशा निराली -सी ।
हिरणी जैसी चाल उसकी ,
मनमोहक मतवाली- सी ।।
इतने अचूक अस्त्र है उसके ,
होश खोते है कई ।
बहुतों ने तो जान ही दे दी ,
बेहोश रहते है कई ।
✒️अष्टभुजा पाण्डेय
Comments
Post a Comment