फूटपाथ के बच्चे

फुटपाथ के बच्चे
गाड़ियों की कर्कश ध्वनि भी,
तब  नीरस पड़ जाती है ।
जब वेदना, मनुष्यता को
अर्धनग्न भेष में लाती है ।।

             फटे पुराने कपड़ों में जब,
             तारे जमीन पर दिखते हैं ।
             उन लोगों को हम क्या देंगे,
             जो खुद ही दुख में हंसते हैं ।।

ना तन पर कपड़ा है,
ना पेट को प्रतिदिन रोटी ।
कहीं बिलखते बच्चे देखें,
कहीं गोद में सिसकती बेटी।।
                       
                 सहसा पूछ लिया था मैंने, 
                 अहंकार के बस में हो कर।
                 कैसे जी  लेते हो जी,
                 ठंड में भी नग्न होकर ।।

उन बेबस आंखों ने मुझे,
फिर ऐसा पहचान दिया।
ठंड क्या करेगा उसका,
जब उसने ही दामन थाम लिया।।
          
                 आंखों में आंसू लेकर,
                मैंने ना कुछ कर पाया ।
                उसको मैं क्या दे सकता, 
               जिससे मैंने इतना पाया ।।

जीने की एहसास दिला दी ,
बच्चों की वह टोलियां ।
अपने मां के पीछे पीछे,
जाती तोतली बोलियां ।।
  
             महलों के कुछ लोग यूं ही,
             कठिनाई की परिभाषा बताते हैं।
             जीवन कठिन मैं देखा उनका ,
             जो फुटपाथो पर पाए जाते हैं ।।

तन पर ना कपड़ा हो,
पेट भूख से जलता है ।
फिर भी नवजीवन आशा में ,
मुख सूरज सा चमकता है
        
           जिन्हें देखकर मैंने पाया,
           जीवन की सच्चाई  ।
           भगवान उन्हें दुख दर्द न दें,
          जिन्होंने ऐसी जीवन पाई ।।

काश उन्हें भी दे देते ईश्वर,
जीवन का एक रंग ।
वह फूल भी खिल उठते,
जीते जीवन का नया ढंग।।


                  अष्टभुजा पांडेय 


            

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