युग परिवर्तन मांग रहा है

नव रचना नव आशाएं,
जीवन में उल्लास भरें |
 स्नेहिल धूप और श्याम शाम भी,
जीवन के दुख दर्द हरे |
देख बसंत का प्यारा आगमन,
 वृक्ष भी पत्ते त्याग रहा हैं |
 कुछ तुम भी बदलो नव जीवन आशा में,}2
अब युग परिवर्तन मांग रहा है ||

 परिवर्तन है नियम प्रकृति का,
 फिर क्यों ना हम स्वीकार करें | 
 खुद को बदलें दूसरों से पहले,
भावी जीवन तैयार करें | 
स्वस्थ समाज की नव रचना का,
अब जीवन ज्योति जाग रहा है |
कुछ तुम भी बदलो नव जीवन आशा में,
अब युग परिवर्तन मांग रहा है ||

भौतिकता के इस युग में हम,
अपने को संपन्न करें |
पर ध्यान रहें राष्ट्र हित का,
दीन जनों के दुख दर्द हरें |
 एहसास हमें हो मानवता का,
 लगे हिंद अब जाग रहा है | 
 कुछ तुम भी बदलो नव जीवन आशा में,
अब युग परिवर्तन मांग रहा है || 

क्या थी रीति, क्या थी नीति, 
सब भूल दिलों में प्रीति रहें |
जो बीत गया सो बीत गया, 
सब हार के अपनी जीत रहें |
घनघोर निशा के मिटने पर,
अरुणोदय का आगाज रहा है |
कुछ तुम भी बदलो नव जीवन आशा में,
अब युग परिवर्तन मांग रहा है|| 

                   ✒️ अष्टभुजा पाण्डेय 

     

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