कविता


रूह तक कांप जाती है, 
सोचकर बड़ी ठंडक है
पीले सिकुड़ पड़े सरसो के फूल,
दूर तक कोहरे से ढका क्षितिज
देखकर
सहम जाता हूं
सोचकर
कैसे रह लेते है लोग बर्फीली सरहदो पर | 
रह जाता हैं मन ममोस के, 
सुनकर सियासत के हुक्कमरनो 
की बेतुकी बातें, 
रो पड़ता हैं दिल देखकर,







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