चीर हरण

भरत वंश के गौरव पर ,
एक कालिख छाई ।
राजा अंधे अंधी सभा ,
वीरता को पड़ी दुहाई ।
जहां धर्म और न्याय के लिए , 
प्रण और प्राण लिए जाते थे ।
रहे शांत सब डरे वहां , 
दुष्ट हँसते इठलाते थे ।
धृतराष्ट्र के दरबार में , 
मतिमंद सी सरकार बनी ।
हुआ खेल चौसर का , 
वैर भाव की रार ठनी  ।
जो धर्म के अवतारी थे , 
बुद्धि उनकी भी मारी थी ।
स्वयं को भी दांव लगाया , 
बांधव संग पत्नी हारी थी ।
शायद विधि को मंजूर था ,
कुरू कुल पर कलंक लगाना था ।
द्युत दुष्टों का खेल है , 
भारत को समझना था ।

Comments

Popular posts from this blog

फूटपाथ के बच्चे

रूप कामिनी

हजारों साल पहले ही भारत ने दे दिया था लोकतंत्र का कॉन्सेप्ट