मैं ठगा सा रह गया

मैं ठगा सा रह गया


उसे देखा तो,
ख्वाब बुनता चला गया ।
उससे आती हवाएं ,
मदहोश कर दी हमें
कौन करता इंतजार
रात्रि का
दिवास्वप्न सा मैं बहता चला गया  ।।
वह पलके झुकाएं खड़ी ,
बिन बोले कुछ कह गई ।
अंदाज रहा अच्छा उसकी बातों का,
जज्बातों का
बिन ठंडी हवा सा
मेरे बदन को सिहर गई।
मैं क्या करता,
आरजू दबाक
देखा तो आसार उमड़ गए ।
जब नजरे टकराई तो
शीतल मुस्कान फैलाकर
आंखें बादलो सा घूमड़ गए ।
आगे बढ़ कर उसे रोकना चाहा,
पर चाह ,चाह सा रह गया ,
आंखें खुली ख्वाब मिटे ,
और मैं ठगा सा रह गया ।।

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