मां
मेरे गिरते -संभालते गुलशन की बागवान है ।
भक्त हूं मैं उसका ,वह मेरी भगवान है।।
क्या लिखूं उसके लिए , अल्फाज भी हैं मेरे छोटे ।
वह माली है इस पौधे की, ना होती तो हम कहां होते
*मां के लिए क्या लिखूं अल्फाज कम हैं
तू सलामत रहें , तुझसे ही हम हैं ।।*
*अपने परिंदे के लिए मां , तू वट वृक्ष है धूप में ।
तू ही ईश्वर है या ईश्वर ही है मां तेरे रूप में ।।*
Comments
Post a Comment