फुटपाथ के बच्चे गाड़ियों की कर्कश ध्वनि भी, तब नीरस पड़ जाती है । जब वेदना, मनुष्यता को अर्धनग्न भेष में लाती है ।। फटे पुराने कपड़ों में जब, तारे जमीन पर दिखते हैं । उन लोगों को हम क्या देंगे, जो खुद ही दुख में हंसते हैं ।। ना तन पर कपड़ा है, ना पेट को प्रतिदिन रोटी । कहीं बिलखते बच्चे देखें, कहीं गोद में सिसकती बेटी।। सहसा पूछ लिया था मैंने, अहंकार के बस में हो कर। कैसे जी लेते हो जी, ठंड में भी नग्न होकर ।। उन बेबस आंखों ने मुझे, फिर ऐसा पह...
बालापन अब बीत गया, आई नूतन तरुनाई । कंदर्प रूप लजाने को , वह रति रूप में आई । बसंत-सा श्रृंगार उसका , देह फुलवारी बन आयी है l कार्य- निवृति लेकर जिसको , प्रकृति निज हाथो से सजाई है ।। कांति वर्णन क्या क्या करें , चांद ही कामिनी बन आया है। दूर खड़ा वह देख रहा, मानो चंद्रकला इसी से पाया है ।। उसके गुलाबी होठों पर , मुग्ध कई जिंदगी हुई । एक बार सही , सौ बार सही , थोड़ी -सी सही ...
किसी भी राष्ट्र को सुचारू रूप से चलाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका वहां की राजनीतिक व्यवस्था की होती है। साथ ही राजनीतिक व्यवस्था के स्तर से ही पता लगता है कि समाज के विकास का स्तर क्या है। आज भारत में हम दौर में जी रहे हैं, उस व्यवस्था को लोकतंत्र कहते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर हमें सिखाया जाता है कि लोकतंत्र पश्चिम की देन है। आज इस ब्लॉग में हम समझने की कोशिश करेंगे कि क्या वास्तव में लोकतंत्र पश्चिम की देन है? साथ ही हम यह भी समझेंगे कि जिस दौर में हम जी रहे हैं क्या वह सही मायनों में लोक यानी आम जन का तंत्र है? कहते हैं कि वैदिक काल में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी। लेकिन क्या राजतंत्र का मतलब सिर्फ एक परिवार की राजशाही थी? नहीं। वैदिक काल के राजतंत्र को समझेंगे तो पाएंगे कि उस दौर का राजतंत्र ही वास्तव में लोकतंत्र था। वैदिक काल के राजतंत्र यानी उसके प्रशासनिक तंत्र को पांच भागों में बांटा गया था। कुल: वैदिक कालीन प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। एक कुल में एक घर में एक छत के नीचे रहने वाले लोग शामिल थे। कुल का प्रमुख सबसे बुजुर्ग व्यक्ति होता था। यहां ध्यान देने वाल...
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