फुटपाथ के बच्चे गाड़ियों की कर्कश ध्वनि भी, तब नीरस पड़ जाती है । जब वेदना, मनुष्यता को अर्धनग्न भेष में लाती है ।। फटे पुराने कपड़ों में जब, तारे जमीन पर दिखते हैं । उन लोगों को हम क्या देंगे, जो खुद ही दुख में हंसते हैं ।। ना तन पर कपड़ा है, ना पेट को प्रतिदिन रोटी । कहीं बिलखते बच्चे देखें, कहीं गोद में सिसकती बेटी।। सहसा पूछ लिया था मैंने, अहंकार के बस में हो कर। कैसे जी लेते हो जी, ठंड में भी नग्न होकर ।। उन बेबस आंखों ने मुझे, फिर ऐसा पह...
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