फाग परधानी के

*फाग परधानी के*

बाबू हो अबकी फगुआ में ,रंग खूब हमहू खेलनी 
जेहिसे नहि बोलत रहली उन्हुसे गले मिल लिहनी 
भईल वाकया अइसन इ , रंग गुलाल उड़वला में
भौजाई से बचके , लरिकान के फुसलावला में ।
बाल्टी भर- भर पानी लेके रंग खूब रहलघोराईल 
छोटका बड़का , यार दोस्त ,सबके ऊपर खूब फेकाइल ।
इहे सब होत रहल , तबहि जोगिरा के राग सुनाइल ।
रंग बरसे एही फागुन में , बेगुची जइसन लोग उपराइल ।
हम ते कहली ये भईया , ई फ़ाग में आग के लगउले बा  ।
भांग के लड्डू मुंह में ठूंस के, कहले परधनी में हाथ अजमौले बा ।
मुंह त मीठा कर दिहलसि , पर तन में लागल आग ।
पांच बरिस ना झकल ,अब खेले अगले फाग।
पांव परल की अइसन लागल हमरो कुछ सम्मान बा ।
मिसिर चाचा कहत रहले , शहर में एकर मकान बा ।।
तबहि सोचली इ लोगवा ,काहे एतना मोहाइल बा ।
बिना भांग के नशा में सब के सब बौराइल बा ।
जे दुख सुख में साथ दिहल , लोग उनकरा के ना जानेला ।
दादुर बन जे टर्रा जाला , ओहि के आपन मानेला
बुढऊ चाचा बतियावत रहले ,नाव जइसन समाज डोलता ।
पांच साल इ गूंगा रहले ,अब कोयल जइसन बोल ता ।
कह लि चाचा राजनीति भी , होली जयसन रीति बा ।
डारि गुलाल गले लगा व , के जाने का प्रित बा 
इहे सब होत रहल ,तबहि बाजे लगल ढोल मजीरा ।
लोग सब थिरक परले गावे फाग जोगीरा ।
रंग उड़ेला , गुलाल उड़े ला, भीगे गोरी के चोली
सदा आनंद रहे यही द्वारे, मोहन खेले होली।


           ✍️ अष्टभुजा पांडेय

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