पंक्तियां

बादल को गिरते देखा है ,
कंकड़ को पाषाण बनते देखा है ।
तुम भी तस्वीर बदल सकते हो , 
तेरे हाथो में भी कर्मो की एक  रेखा है ।। 


मुबारकबाद तो मैं भी दे देता ,
          पर क्या दे ,जो नजाकत बदल दे ।
चाहता हूं ,कुछ दू ऐसा , 
          जो उन्हे खुद को खुद से रूबरू कर दे ।।

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